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बांग्लादेश की आजादी से भी पुरानी है जमात-ए-इस्लामी, फिर क्यों मिली करारी हार; जानें पाकिस्तान प्रेमी पार्टी का इतिहास

Written By: Dharmendra Kumar Mishra @dharmendramedia Published : Feb 13, 2026 11:08 am IST, Updated : Feb 13, 2026 11:15 am IST

बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव में भले ही जमात-ए-इस्लामी ने अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया हो, लेकिन उसे बीएनपी के आगे करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। जमात को विपक्ष बनने का तोहफा भी आवामी लीग की गैरमौजूदगी की वजह से मिला है।

शफीकुर रहमान, जमात-ए-इस्लामी पार्टी के लीडर।- India TV Hindi
Image Source : AP शफीकुर रहमान, जमात-ए-इस्लामी पार्टी के लीडर।

ढाकाः बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव में पाकिस्तान की प्रेमी और कट्टर इस्लामवादी सोच रखने वाली जमात-ए-इस्लामी पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। भारत के खिलाफ अक्सर जहर उगलने के लिए जानी जाने वाली जमात-ए-इस्लामी पार्टी का इतिहास वैसे तो बांग्लादेश की आजादी से भी पुराना है। मगर किसी भी चुनाव में यह कभी प्रमुख भूमिका में नहीं आ पाई। 12 फरवरी को 299 संसदीय सीटों के लिए हुए आम चुनाव में यह पार्टी 60 सीटों के आसपास ही सिमट कर रह गई। इससे जमात-ए-इस्लामी की कट्टरवादी विचाधारा को तगड़ा झटका लगा है। इसकी अगुवाई फिलहाल शफीकुर रहमान कर रहे हैं।

जमात-ए-इस्लामी को क्यों मिली करारी हार?

जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश की राजनीति में सबसे विवादास्पद और पुरानी पार्टियों में से एक है। इसकी जड़ें 1941 में मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी द्वारा स्थापित मूल जमात-ए-इस्लामी से जुड़ी हैं, जो स्वतंत्र बांग्लादेश (1971) से 30 साल पहले अस्तित्व में आई थी। यह पहले पूर्वी पाकिस्तान में 1955 से सक्रिय थी, जो पाकिस्तान से अलग होकर अब बांग्लादेश बन गया। यह पार्टी उसी दौर से ही इस्लामी शासन की वकालत करती रही। 2026 के चुनाव में जमात-ए-इस्लामी ने 11-पार्टियों के साथ गठबंधन करके हिस्सा लिया।

जमात ने अपने चुनाव वादों में भ्रष्टाचार विरोध, आर्थिक सुधार (VAT कम करना, ब्याज-मुक्त ऋण) और इस्लामी मूल्यों पर फोकस किया। इस पार्टी की हार की प्रमुख वजह इसका पाकिस्तान प्रेम और कट्टरता है। आज भी 1971 के युद्ध में पाकिस्तान से प्रेम रखने का कलंक पार्ची के माथे से हटा नहीं है। बांग्लादेशी लोग अभी भी जमात को 'पाकिस्तान प्रेमी' और 'रजाकार' मानते हैं। जुलाई-अगस्त 2024 में Gen-Z के आंदोलन ने भले ही सत्ता से शेख हसीना को हटा दिया, लेकिन जमात की पाकिस्तान-समर्थक छवि से कट्टरवादियों के अलावा अन्य जनता दूर रही। इसके अलावा हिंदुओं ने भी जमात से पूरी तरह दूरी रखी और बीएनपी को सपोर्ट किया। जमात का मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ बयानबाजी और उनको टिकट नहीं देना भी इसकी हार के मुख्य कारणों में से एक रहा। 

1971 के युद्ध में जमात ने किया था पाकिस्तान समर्थन

बांग्लादेश की आजादी के दौरान जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया। जमात ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता को मुस्लिम एकता के लिए खतरा माना था और पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर शांति समिति और अल-बद्र, अल-शम्स जैसे सहायक दलों का गठन किया। इन दलों पर लाखों बंगालियों की हत्या, बलात्कार और यातनाओं के आरोप लगे। इसके बाद युद्ध अपराध ट्रिब्यूनल ने कई जमात नेताओं को दोषी ठहराया, जैसे गुलाम आजम, मतीउर रहमान नियाजी आदि। बांग्लादेश की आजादी मिलने के बाद 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर रहमान ने जमात पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया। 

1975 में मुजीब की हत्या के बाद हटा बैन

1975 में जब शेख मुजीबुर रहमान की हत्या हो गई तो जनरल जिया-उर-रहमान ने अपने शासन में 1979 में जमात पर लगे प्रतिबंधों को हटा दिया। इसके बाद जमात ने 1986 में पहली बार चुनाव लड़ा और 10 सीटें जीतीं। इसके बाद 1991 में 18 और  2001 में 17 सीटें जीतकर बीएनपी के साथ गठबंधन में सरकार में शामिल हुई। हालांकि 2013 में अवामी लीग सरकार ने युद्ध अपराध ट्रिब्यूनल के फैसले को आधार बनाकर जमात पार्टी का पंजीकरण रद्द कर दिया और कई नेताओं को सजा दी गई। बाद में 2024 के छात्र आंदोलन (जुलाई क्रांति) के बाद हसीना सरकार के पतन के बाद कार्यवाहक सरकार के मुखिया बने मोहम्मद यूनुस ने जमात पर लगे सभी प्रतिबंधों को हटा दिया। जून 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने पार्टी को बहाल कर दिया। 

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